साल्हेर किला जानकारी | Salher Fort Information in Hindi
• स्थान :
महाराष्ट्र राज्य के नाशिक जिले के सटाणा तहसील में महाराष्ट्र-गुजरात सीमा पर साल्हेर किला स्थित है।
• साल्हेर किले के अन्य नाम :
सालगिरी, शैल्यगिरी, महेंदेगिरी
• ऊंचाई :
इस किले की समुद्र तल से औसत ऊंचाई लगभग 1567 मीटर / 5141 फीट है।
• महाराष्ट्र का सबसे ऊँचा शिखर कलसुबाई माना जाता है, लेकिन किलों में सबसे ऊँचा होने का मान और अत्यंत ऊँचा होने के कारण साल्हेर किला सभी किलों का जिरेटोप (मुकुट) माना जाता है।
• साल्हेर किला देखने के लिए यात्रा मार्ग :
• मुंबई से नाशिक की दूरी लगभग 166 किमी है, जबकि पुणे से लगभग 120 किमी दूरी है। वहाँ से सटाणा पहुँचना पड़ता है। सटाणा से लगभग 50 किलोमीटर दूरी पर साल्हेर किला स्थित है।
• गुजरात की ओर से यदि आप सूरत मार्ग से आ रहे हैं, तो
नवसारी – अहवा – पांडवा – महारदरा – बाभुलणे – आलियाबाद से आगे दक्षिण की ओर मुड़कर वाघांबे मार्ग से साल्हेरवाड़ी पहुँचकर आगे साल्हेर किले तक जा सकते हैं।
• सटाणा की ओर से आने पर
डांगसौदाणे – साल्हेर – साल्हेरवाड़ी मार्ग से साल्हेर किले पर पहुँचा जा सकता है।
• नाशिक की ओर से आने पर
नाशिक – दिंडोरी – वणी – नंदुरी – मोहदरी – अभोना – कनाशी – कारंजखेडा – साकोडे – साल्हेरवाड़ी मार्ग से किले तक पहुँचा जा सकता है।
• किले के पायथ्य (नीचे) से जाने वाले मार्ग :
• वाघांबे से :
वाघांबे से किले की ओर पैदल जाते समय साल्हेर-सालोटा खिंड से आगे बढ़ने पर किला चढ़ते समय चार दरवाजे लगते हैं। इस मार्ग से किले पर पहुँचा जा सकता है।
• साल्हेरवाड़ी मार्ग :
यह सीधा रास्ता है और इस मार्ग से किले पर चढ़ते समय छह दरवाजे लगते हैं।
• मालदर मार्ग :
मालदर से भी साल्हेर-सालोटा खिंड के रास्ते किले तक मार्ग जाता है, लेकिन इस रास्ते का उपयोग सामान्यतः कम किया जाता है।
देखणे लायक ठिकाणे :
• वाहनतल (पार्किंग स्थान) :
साल्हेरवाड़ी से किले की ओर जाने वाले रास्ते पर आगे बढ़ने पर सबसे पहले वाहनतल (पार्किंग स्थान) आता है। यहाँ कई होटल हैं जहाँ अल्पोपहार की सुविधा मिल जाती है। यहाँ वाहन पार्किंग की भी व्यवस्था है।
• पायवाट और वीरगल :
किले की ओर पैदल पगडंडी से जाते समय रास्ते में वीरगल (वीरगाल) देखने को मिलती है। यह एक ढाल धारण किए हुए और भाला फेंकने वाले योद्धा की शिल्पाकृति है। संभवतः प्राचीन काल में युद्ध में विजय प्राप्त करने वाले योद्धा की स्मृति में इसे बनाया गया होगा।
• भवानी देवी मंदिर :
रास्ते में आगे बढ़ते समय बाईं ओर थोड़ी दूरी पर भवानी माता का मंदिर भी देखने को मिलता है।
• खतरनाक कात्याल सीढ़ी मार्ग :
रास्ते से आगे किले पर चढ़ते समय बहुत खड़ी चढ़ाई लगती है। यह अत्यंत कठिन सीढ़ी मार्ग है। ये सीढ़ियाँ कात्याल (कठोर) चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं।
एक तरफ बिल्कुल सीधा खड़ा कड़ा है और उसी कड़े को काटकर इन सीढ़ियों का निर्माण किया गया है।
• गणेश शिल्प :
रास्ते में हमें कड़े पत्थर में खोदा हुआ गणेश का शिल्प दिखाई देता है। विघ्नों का नाश करने वाले भगवान गणेश की यह प्रतिमा किले पर आने वाली विपत्तियों को दूर करने के लिए बनाई गई होगी।
• प्रथम दरवाजा :
ऊपर चढ़कर आने के बाद सबसे पहले हमें पहला दरवाजा दिखाई देता है। इसकी चौकट आज भी सुरक्षित है। इसके ऊपर की मेहराब पर हिंदू देवताओं का प्रतीक माने जाने वाले कमल पुष्प की नक्काशी की गई है। इसके साथ ही अन्य सुंदर नक्काशी भी देखने को मिलती है।
• सीढ़ी मार्ग :
पहले दरवाजे से ऊपर फिर से सीढ़ियों वाला मार्ग शुरू होता है। रास्ते के किनारे कुछ जगहों पर किले की तटबंदी (किलेबंदी) दिखाई देती है, तो कुछ जगहों पर कठिन चढ़ाई लगती है।
• इस मार्ग पर थोड़ी-थोड़ी दूरी पर एक के बाद एक कुल छह दरवाजे हैं। इन दरवाजों की रचना प्राचीन हिंदू वास्तुशास्त्र के अनुसार की गई है। इन दरवाजों पर हिंदू धर्म के प्रतीक भी देखने को मिलते हैं।
• किले का क्रमबद्ध मजबूत दरवाजा तथा समानांतर तटबंदी वाला मार्ग दिखाई देता है।
• पहाड़ी गुफाएँ और समानांतर पगडंडी :
किले का तीसरा दरवाजा पार करने के बाद एक ऊँची खड़ी पत्थर की दीवार जैसी चट्टान दिखाई देती है और उसके पास एक संकरी पगडंडी मिलती है। इस रास्ते से हम किले के ऊपरी भाग की ओर जा सकते हैं।
इस रास्ते से जाते समय हमें पहाड़ की चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ तथा पानी की टंकियाँ दिखाई देती हैं। इन खुदी हुई टंकियों और गुफाओं की संख्या लगभग 20 से 21 के आसपास मानी जाती है।
इन गुफाओं को बनाने के दौरान निकले हुए पत्थरों का उपयोग सुरक्षात्मक तटबंदी, अन्य इमारतों और किले के दरवाजों के निर्माण में किया गया होगा।
• चौथा दरवाजा :
किले का चौथा दरवाजा भी अन्य दरवाजों की तरह ही बनाया गया है। लेकिन यहाँ दरवाजे की कमान पर एक शिलालेख खुदा हुआ दिखाई देता है।
• वाड़े (महल) के अवशेष :
किले के ऊपर की ओर आने पर एक पुराना निर्माण अवशेष दिखाई देता है। यहाँ सीढ़ियाँ और आधार (जोते) के अवशेष दिखाई देते हैं। ये उस समय की इमारतों के अवशेष हैं।
संभवतः इस स्थान पर उस समय सरदार, अधिकारी, किल्लेदार और अन्य कर्मचारियों की बैठकें होती थीं।
• विस्तृत प्रांगण :
किले के ऊपरी भाग में एक विशाल और विस्तृत प्रांगण दिखाई देता है।
• पानी की टंकियाँ :
किले के निर्माण के लिए पत्थर नीचे के हिस्सों से निकाले गए थे। जहाँ से पत्थर निकाले गए, उन्हीं स्थानों पर बाद में पानी की टंकियाँ बन गईं।
इन टंकियों का पानी उस समय पीने और अन्य आवश्यक कार्यों के लिए उपयोग में लाया जाता था।
• कात्याल निवास कक्ष :
किले पर चट्टानों को काटकर बनाए गए कात्याल कमरे भी देखने को मिलते हैं। इनका उपयोग पहले निवास स्थान के रूप में किया जाता था। आज भी ये कमरे अच्छी स्थिति में मौजूद हैं।
• हनुमान मंदिर :
किले की कात्याल गुफाओं में से एक स्थान पर संकटमोचन हनुमान जी की मूर्ति देखने को मिलती है। यह मूर्ति कठिन समय में योद्धाओं को प्रेरणा देने का कार्य करती होगी।
• गंगासागर तालाब :
मध्यकालीन समय में किले पर पानी की आवश्यकता पूरी करने के लिए गंगासागर तालाब का निर्माण किया गया था। इसकी संरचना बहुत सुंदर है।
यह तालाब किले के ऊपरी भाग में स्थित है। भीषण गर्मियों में भी इसमें पर्याप्त पानी रहता है।
पानी की ऊँचाई मापने के लिए तालाब के बीच में एक स्तंभ (खंभा) भी बनाया गया है।
• रेणुका देवी मंदिर :
तालाब के पास हमें देवी रेणुका का मंदिर देखने को मिलता है। मंदिर के शिखर (कलश) भाग को टूटा हुआ देखा जा सकता है। गर्भगृह में देवी की मूर्ति स्थापित है और पास में गणेश जी की मूर्ति भी देखने को मिलती है।
मान्यता है कि रेणुका देवी के पुत्र भगवान परशुराम का निवास इस स्थान पर था और उन्होंने ही यहाँ देवी की स्थापना की थी। मंदिर के बाहर के स्तंभों पर सुंदर नक्काशी भी दिखाई देती है।
• यज्ञ वेदी :
किले पर मंदिर से कुछ दूरी पर एक यज्ञ वेदी स्थित है। प्राचीन समय में इस स्थान पर होम और हवन किए जाते थे।
• परशुराम मंदिर :
मान्यता है कि भगवान परशुराम ने संपूर्ण पृथ्वी जीतकर ब्राह्मणों को दान कर दी थी। इसके बाद अपने लिए नया प्रदेश बनाने के उद्देश्य से वे साल्हेर किले पर आए। यहाँ कुछ समय तक उन्होंने तपस्या की और यहीं से अपने धनुष-बाण से समुद्र को पीछे हटाया और नई भूमि का निर्माण किया, जिसे आज कोकण भूमि कहा जाता है।
जिस स्थान से उन्होंने बाण छोड़ा और जहाँ उन्होंने तप किया, वह स्थान साल्हेर किला ही माना जाता है। किले के ऊपरी शिखर भाग में परशुराम मंदिर देखने को मिलता है। इस मंदिर में पादुका और भगवान परशुराम की मूर्ति स्थापित है।
• साल्हेर किले के बारे में ऐतिहासिक जानकारी :
• साल्हेर किला महाराष्ट्र और गुजरात राज्य की सीमा पर स्थित है।
• प्राचीन समय में इस स्थान पर भगवान परशुराम का निवास था। उन्होंने संपूर्ण पृथ्वी दान करने के बाद अपने निवास के लिए यहाँ तपस्या की। इसके बाद इस ऊँचे पर्वत से उन्होंने बाण चलाकर समुद्र को पीछे हटाया और कोकण भूमि का निर्माण किया, फिर वे कोकण क्षेत्र में चले गए।
• इस किले को महेंदगिरी नाम से भी जाना जाता है। इस स्थान पर भगवान रामचंद्र, भगवान हनुमान और सुग्रीव का भी निवास रहा था, ऐसी मान्यता है।
• इस क्षेत्र में कई हिंदू राजवंशों का शासन रहा। यहाँ गवली (गवली) राज्य की सत्ता भी थी। उसी के नाम पर इस किले को गवलीगड भी कहा गया।
• सन 1340 में नागदेवराजा नामक राजा ने महेश गवली राजा से यह किला जीत लिया।
• आइने-अकबरी में दर्ज जानकारी के अनुसार सन 1609 में साल्हेर के राजा ने अहमदनगर के मलिक अंबर द्वारा सूरत पर आक्रमण किए जाने के समय मुगलों को अपनी सेना भेजकर सहायता की थी।
• सन 1636 में औरंगजेब दक्षिण का सूबेदार (राज्यपाल) बना। उसके बाद सन 1637 में उसने बागलाण प्रदेश जीत लिया और साल्हेर तथा मुल्हेर किले अपने अधिकार में ले लिए। इसके बाद साल्हेर का नाम सुलतानगढ़ रखा गया।
• मध्यकाल में इस क्षेत्र में बाभुलराजा का शासन था। उसी के नाम पर इस प्रदेश का नाम बागलाण पड़ा।
• छत्रपति शिवाजी महाराज के समय महाराष्ट्र का क्षेत्र प्रशासनिक रूप से कई प्रांतों में विभाजित था जैसे –
पुणे, मावल, वाई, सातारा, कराड, पन्हाला, दक्षिण कोकण, ठाणे, बिंदुर, कोलार, त्रिंबक, कर्नाटक, वेल्लोर और बागलाण।
• सन 1663 में छत्रपति शिवाजी महाराज ने साल्हेर और मुल्हेर किले जीतकर स्वराज्य का विस्तार किया।
• सूरत की पहली लूट से प्राप्त संपूर्ण संपत्ति इसी मार्ग से स्वराज्य में लाई गई थी।
• सन 1665 में पुरंदर की संधि के अंतर्गत साल्हेर किला बादशाह औरंगजेब को वापस करना पड़ा।
• 3 दिसंबर 1670 से 11 जनवरी 1671 के बीच मराठों ने साल्हेर किले को फिर से स्वराज्य में शामिल कर लिया। उस समय किले का किलेदार फतूनखान असावधान था। मराठों ने रस्सी की सीढ़ियों की सहायता से किले पर चढ़ाई की। इस युद्ध में मुगल किलेदार मारा गया।
• सूरत की दूसरी लूट से प्राप्त संपत्ति को सूरत – बारडोली – डांग – बहावा – साल्हेर – मुल्हेर – सटाणा – तलवण – वणी – दिंडोरी – नाशिक – सिन्नर – जुन्नर – पुणे – राजगढ़ मार्ग से लाया गया था।
• इस पूरे अभियान में अत्यधिक गोपनीयता रखी गई थी। फिर भी साल्हेर के आगे की खिंड में मराठों और मुगलों के बीच संघर्ष हुआ। मुगलों की ओर से इखलास खान और बेहलोल खान थे, जबकि मराठों की ओर से स्वयं छत्रपति शिवाजी महाराज और उनके प्रमुख सरदार मौजूद थे।
• उस समय लूट को वणी मार्ग से आगे भेजकर मराठों ने मुगलों के साथ जोरदार युद्ध किया और उन्हें पराजित किया। इस युद्ध में शिवाजी महाराज को 6000 घोड़े, 125 ऊँट, 6000 बैल तथा अन्य खजाना प्राप्त हुआ।
• इसके बाद कुछ समय तक यह किला मुगलों और कुछ समय मराठों के अधिकार में रहा।
• आगे चलकर यह किला पेशवा शासन में शामिल हुआ।
• ब्रिटिश शासन के बाद यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधिकार में आ गया।
इस प्रकार साल्हेर किले का इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण और गौरवशाली है।
























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