श्री मलंग गढ़ की जानकारी
Sri Malanggad information in Hindi
• स्थान :
महाराष्ट्र राज्य के ठाणे जिले में सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में, माथेरान के पास मलंगगढ़ स्थित है।
• ऊँचाई :
मलंगगढ़ की औसत ऊँचाई लगभग 3200 फीट है।
मलंगगढ़ जाने के मार्ग :
• मुंबई से :
तळोजा – चिंधरण मार्ग से निटले, वहाँ से वाड़ी होते हुए मलंगगढ़ जाया जा सकता है।
• कल्याण से :
डोंबिवली मार्ग से पाळावा सिटी, वहाँ से खोणी पागड्याचा पाड़ा, आगे वाड़ी और वहाँ से मलंगगढ़।
• बदलापुर से :
अंबरनाथ मार्ग से मलंगगढ़ फाटा होकर मलंगगढ़।
• पुणे से :
पिंपरी-चिंचवड मार्ग से लोणावळा – कर्जत – बदलापुर, फिर अंबरनाथ मार्ग से मलंगगढ़।
• परिवहन सुविधा :
मलंगगढ़ जाने के लिए कल्याण से टैक्सी और बस की सुविधा उपलब्ध है।
मलंगगढ़ पर देखने योग्य स्थान :
• वाहनतळ (पार्किंग स्थल) :
बस या टैक्सी से मलंगगढ़ के पायथ्य में स्थित मलंगगांव के वाहनतळ तक पहुँचा जा सकता है। यहाँ से किले का दूर से दर्शन होता है।
• सीढ़ी मार्ग :
गढ़ पर जाने के लिए पक्की सीढ़ियों का मार्ग है। यह मार्ग पिरमाची तक जाता है।
• शिवपिंड :
रास्ते में एक शिवपिंड देखने को मिलता है।
• दुर्गामाता मंदिर :
सीढ़ी मार्ग से आगे बढ़ने पर दुर्गा देवी का मंदिर आता है।
• दुकानें एवं पूजा सामग्री :
यह धार्मिक स्थल होने के कारण यहाँ अनेक श्रद्धालु आते हैं। उनकी सुविधा के लिए पूजा सामग्री की दुकानें तथा नाश्ता व अल्पाहार के होटल उपलब्ध हैं।
• पिरमाची :
माची अर्थात किले पर निगरानी के लिए प्राकृतिक रूप से बनी समतल जगह। मलंगगढ़ की ओर जाते समय सबसे पहले पिरमाची आती है। इस क्षेत्र में कई दुकानें, एक दरगाह तथा अन्य आवासीय इमारतें स्थित हैं।
• दरगाह :
आगे पैदल चढ़ाई करने पर एक दरगाह दिखाई देती है। यह हाजी मलंग दरगाह है।
• सोनमाची मार्ग :
दरगाह के सामने स्थित दुकानों के बीच से एक पगडंडी किले की दिशा में जाती है।
• पत्थरीला पगडंडी मार्ग :
पीरमाची से ऊपर सोनमाची की ओर जाते समय रास्ते में कई बड़े पत्थर और शिलाखंड गिरे हुए दिखाई देते हैं। इसी मार्ग से कात्याळ पत्थरीली सीढ़ी मार्ग के पास पहुँचा जाता है।
• कात्याल सीढ़ी मार्ग :
पत्थरों से भरे कठिन मार्ग से ऊपर चढ़ने पर ऊँचे बेसाल्ट शैल-खंड का सीधा कड़ा भाग मिलता है। इस कड़े भाग में एक ओर से काटकर सीढ़ियाँ बनाई गई हैं। असमान आकार की ये सीढ़ियाँ चढ़ने में कठिन हैं। जगह-जगह बनी खांचों में हाथ डालते हुए इस मार्ग से ऊपर स्थित सोनमाची तक पहुँचा जा सकता है। किले पर आक्रमण के समय पीरमाची से अंग्रेजों ने तोपों की गोलाबारी की, परंतु गोले द्वार तक नहीं पहुँच सके। हालांकि सीढ़ी मार्ग पर स्थित चट्टानें टूट गईं।
• सोनमाची द्वार :
सीढ़ी मार्ग से कठिन चढ़ाई पूरी कर ऊपर पहुँचने पर ऊँची चट्टान में एक भग्न द्वार और बुर्ज दिखाई देता है। यही सोनमाची का प्रवेश द्वार था, जो समय और आक्रमणों में नष्ट हो गया। वर्तमान में खड़े स्तंभ और बुर्ज का पत्थरीला निर्माण शेष है।
• वाड़ों एवं अन्य इमारतों के अवशेष :
सोनमाची पर पहुँचने पर पैरों के स्तर तक कुछ निर्माण अवशेष दिखाई देते हैं। ये वहाँ रहने वाले सैनिकों, किलेदार, पहरेदार, सिपाही और प्रशासनिक अधिकारियों के निवास व कार्यस्थल रहे होंगे।
• शौच कूप :
सोनमाची पर एक ओर मध्ययुगीन काल का शौच कूप (शौचालय) का निर्माण देखने को मिलता है।
• चोर दरवाजा :
सोनमाची पर एक चोर दरवाजा भी है, जिसे संकट के समय उपयोग हेतु बनाया गया था। यह एक गहरी खाई की ओर उतरता है।
• पानी की टंकियाँ :
सोनमाची से बालेकिल्ला की ओर जाते समय तथा अन्य दिशाओं में चट्टानों को काटकर पानी की टंकियाँ बनाई गई हैं। वर्षा ऋतु में इनमें वर्षा का पानी एकत्र होता था और पूरे वर्ष उपयोग में लाया जाता था।
• कठिन युद्ध मार्ग :
सोनमाची से बालेकिल्ला की ओर जाने वाला मार्ग अत्यंत संकरा है। एक ओर खड़ी चट्टान है और पैरों के लिए लगभग एक फुट चौड़ा रास्ता है, जबकि दूसरी ओर तीव्र ढलान है। यदि शत्रु बालेकिल्ला की ओर आता, तो ऊपर से पत्थर फेंककर उसे नष्ट किया जा सकता था या वह गहरी खाई में गिर सकता था। ऐसी रचना दिखाई देती है।
• संकरी व टूटी हुई राह :
बालेकिल्ला की ओर जाने वाली यह संकरी राह कई स्थानों पर टूटी हुई है। जगह-जगह रस्सियाँ, लोहे की पाइपें और रॉड लगाए गए हैं। वर्तमान में बालेकिल्ला जाना अत्यंत जोखिमपूर्ण है, फिर भी अनेक पर्वतारोही इस मार्ग से जाने का प्रयास करते हैं।
• विश्राम देवड़ियाँ :
बालेकिल्ला की ओर जाते समय चट्टानों में काटकर बनाई गई विश्राम देवड़ियाँ जगह-जगह दिखाई देती हैं।
• बालेकिल्ला :
किले का सबसे ऊपरी भाग बालेकिल्ला कहलाता है।
• पानी की टंकियाँ (बालेकिल्ला) :
बालेकिल्ला पर कई पानी की टंकियाँ खुदी हुई दिखाई देती हैं। भीषण गर्मी में भी ये सूखती नहीं हैं। बालेकिल्ला के निर्माण हेतु आवश्यक पत्थर इसके निचले भाग से निकाले गए, जहाँ अनेक पानी की टंकियाँ बनाई गईं।
• बालेकिल्ला की आवासीय इमारतें व सदर :
बालेकिल्ला के ऊँचे भाग में बिना छत की, चारों ओर से मजबूत बनी हुई एक इमारत आज भी सुरक्षित दिखाई देती है। यहाँ किले के मुख्य अधिकारी, किलेदार और अन्य अधिकारी संकट के समय रहते थे। यहीं हथियारों और अनाज का भंडारण किया जाता था तथा गुप्त बैठकों का आयोजन भी होता था।
• परिसर दर्शन :
बालेकिल्ला मलंगगढ़ का सर्वोच्च भाग है। यहाँ से पूरे क्षेत्र का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।
• वापसी मार्ग :
किला देखने के बाद उसी मार्ग से वापस लौटना पड़ता है।
मलंगगढ़ का ऐतिहासिक विवरण :
• मलंगगढ़ पर दत्त संप्रदाय के मच्छिंद्रनाथ की समाधि है, जिसकी पूजा मुस्लिम धर्मावलंबी करते हैं। यह स्थान हिंदू और मुस्लिम धर्मों के बीच विवादातीत है। माघ महीने की पूर्णिमा को यहाँ मेला भरता है।
• मलंगगढ़ का प्रथम निर्माण शिलाहार वंश के काल में हुआ।
• बाद में यह किला यादव, बहामनी, निज़ामशाही और अंततः मुगलों के अधीन रहा।
• स्वराज्य की स्थापना के बाद यह किला मराठा शासन में शामिल हुआ।
• पेशवाकाल में सन 1780 ई. में अंग्रेज अधिकारी आंबिंग्डन ने मलंगगढ़ पर आक्रमण किया।
• वर्षा ऋतु में मराठा किसान कृषि कार्यों में व्यस्त रहते थे और किले पर सीमित सैन्य बल होता था। इसी का लाभ उठाने के उद्देश्य से आंबिंग्डन ने मलंगगढ़ पर आक्रमण किया। उसने पीरमाची पर अधिकार कर वहाँ से तोपें लगाकर सोनमाची पर आक्रमण किया, परंतु वह असफल रहा क्योंकि तोपों के गोले वहाँ तक नहीं पहुँच पाए। इसके बाद उसने नाकेबंदी कर मराठों की रसद रोक दी। फिर भी मराठों ने कड़ा प्रतिकार किया। अंततः अंग्रेजों ने किला अपने कब्जे में ले लिया।
• इसके बाद यह किला ब्रिटिश शासन के अधीन रहा।
• भारत की स्वतंत्रता के बाद यह किला स्वतंत्र भारत सरकार के अधीन आ गया।
इस प्रकार मलंगगढ़ की संपूर्ण जानकारी।

















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