भाजे लेणी (Bhaje Leni)
स्थान :
महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में, लोनावला से कुछ दूरी पर स्थित मळवली स्टेशन के पास, भाजे गाँव में सह्याद्री पर्वत श्रृंखला में भाजे लेणी देखने को मिलती हैं।
ऊँचाई :
ये लेणियाँ भाजे गाँव से पहाड़ी पर लगभग 400 फीट की ऊँचाई पर स्थित हैं।
भाजे लेणी देखने जाने का यात्रा मार्ग :
महाराष्ट्र राज्य के पुणे और मुंबई जैसे अंतरराष्ट्रीय महत्व के शहरों से कुछ ही दूरी पर भाजे लेणी स्थित हैं।
पुणे से पहले लोनावला, फिर आगे मळवली स्टेशन, वहाँ से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर भाजे लेणी हैं।
मुंबई से रेल मार्ग या सड़क मार्ग द्वारा लोनावला पहुँचा जा सकता है, वहाँ से भाजे लेणी जाया जा सकता है।
भाजे लेणी परिसर में दे
खने योग्य स्थल :
सीढ़ी मार्ग :
भाजे गाँव पहुँचने के बाद लेणी परिसर में जाने के लिए सीढ़ियों वाला मार्ग मिलता है। इसी मार्ग से चढ़कर पर्यटक भाजे लेणी के प्रांगण तक पहुँचते हैं। यह एक पक्का, निर्मित सीढ़ी मार्ग है।
चैत्य गृह :
सीढ़ियों से ऊपर पहुँचने पर सबसे पहले टिकट लेना पड़ता है। आगे बढ़ने पर एक विशाल चैत्य गृह दिखाई देता है। इसके बाहरी भाग में यक्षिणी की शिल्पाकृति दिखाई देती है।
चैत्य की रचना पीपल के पत्ते के आकार की कमान वाली है। सुंदर वेदिका पट्टी और उस पर की गई नक्काशी दर्शनीय है। चैत्य की छत गज-पृष्ठ (हाथी की पीठ के आकार) जैसी है और यह लगभग 2200 वर्ष पुरानी है।
चैत्य के भीतर मध्य भाग में स्तूप स्थित है तथा दोनों ओर अष्टकोणीय आकार के स्तंभ हैं। कुल 27 स्तंभ यहाँ देखे जा सकते हैं। स्तंभों के पीछे से प्रदक्षिणा मार्ग बना हुआ है।
स्तंभों पर कमल पुष्प, चक्र, एक स्थान पर खूँटी और उस पर लटका हार जैसी सुंदर नक्काशियाँ उकेरी गई हैं। खंभों पर कुछ अस्पष्ट चित्र भी दिखाई देते हैं, जो संभवतः बुद्ध के हैं।
ऊपर की लकड़ी की बीमें (तुळया) आज भी अच्छी अवस्था में सुरक्षित हैं।
यहाँ बुद्ध भिक्षु धार्मिक चर्चाएँ, संवाद तथा अध्ययन किया करते थे। यह चैत्य लगभग 17 मीटर लंबा और 8 मीटर चौड़ा है। चैत्य की कमान पर लगभग 172 छिद्र दिखाई देते हैं।
दो-मंज़िला विश्राम कक्ष :
चैत्य के पास ऊँचे पहाड़ में भीतर की ओर खोदकर बनाए गए कक्ष देखने को मिलते हैं। इनमें बैठने की व्यवस्था है तथा जगह-जगह गवाक्ष (खिड़कीनुमा झरोखे) बने हुए हैं।
वर्षा ऋतु के दौरान तथा चारिका करते हुए बुद्ध धर्म का प्रचार करने वाले भिक्षुओं के निवास के लिए ये कक्ष बनाए गए होंगे। इनमें ऊपर जाने के लिए भीतर ही सीढ़ी मार्ग भी खोदकर बनाया गया है।
• यहाँ कुल 22 लेणियाँ देखने को मिलती हैं। इनमें से एक चैत्य है तथा शेष विहार हैं।
• विहारों में विश्राम कक्ष और आसन कक्ष देखने को मिलते हैं।
पीने के पानी के लिए हौद (जल टंकियाँ) :
जगह-जगह पीने के पानी की टंकियाँ चट्टान काटकर बनाई गई दिखाई देती हैं। इनका पानी अत्यंत शुद्ध और पीने योग्य है। अत्यंत कलात्मक ढंग से तराशी गई ये टंकियाँ विहारों के पास स्थित हैं। वर्षा ऋतु में ऊपर की पहाड़ियों से बहकर आने वाला पानी इनमें संग्रहित होता था और वर्षभर उपयोग में लाया जाता था।
ध्यान-धारणा कक्ष :
कुछ लेणियों में भीतर की ओर छोटी-छोटी कक्षाएँ खोदी हुई दिखाई देती हैं। ये ध्यान-धारणा के लिए बनाई गई थीं। बुद्ध धर्म का प्रचार करने वाले भिक्षु जब यहाँ निवास करते थे, तब ध्यान के लिए इन कक्षों का उपयोग करते थे।
स्तूप :
लेणियाँ देखते समय एक स्थान पर कई स्तूप बने हुए दिखाई देते हैं। इनमें से अनेक स्तूप आज भी अत्यंत अच्छी अवस्था में हैं। कहा जाता है कि ये स्तूप बुद्ध भिक्षुओं की स्मृति के प्रतीक रूप में निर्मित किए गए होंगे।
सूर्य लेणे :
बुद्ध शिल्पाकृतियाँ
भाजे लेणी देखते हुए एक सुंदर लेणे दिखाई देता है, जिसके बाहरी भाग में कई खंभे हैं और उन पर सुंदर शस्त्रधारी द्वारपाल उकेरे हुए दिखाई देते हैं। ये द्वारपाल हथियार धारण किए हुए हैं और साथ ही लेणी की दीवारों पर अनेक वन्य प्राणी भी चित्रित हैं। इस स्थान पर चंद्र-सूर्य का दृश्य तथा अनेक शिल्पाकृतियाँ देखने को मिलती हैं।
पहले शिल्प में चार घोड़ों के रथ पर सवार सूर्यदेव, उनकी छाया और संध्या नामक दो पत्नियों के साथ दिखाई देते हैं। उनके साथ दासियाँ भी हैं, जो हाथों में छत्र और चामर धारण कर सूर्यदेव पर चंवर ढालती हुई दर्शाई गई हैं। यह शिल्प संभवतः हिंदू और बौद्ध धर्म के संक्रमण काल में बनाया गया होगा।
भाजे लेणी अत्यंत प्राचीन लेणियाँ हैं, जिन्हें ईस्वी सन की दूसरी शताब्दी में खोदा गया था। अनेक कारीगरों ने छेनी-हथौड़े का उपयोग कर इन्हें तराशा है। ये लेणियाँ तत्कालीन जीवनशैली की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करती हैं।
इस प्रकार, यह है भाजे लेणियों के बारे में संपूर्ण जानकारी।
Bhaje Leni jankari hindi me























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