शनिवार वाडा (पुणे) जानकारी
Shanivar Vada information in Hindi
स्थान :
महाराष्ट्र राज्य की सांस्कृतिक राजधानी पुणे में बहने वाली मुठा नदी के थोड़े पास यह वाडा मराठा साम्राज्य के पंतप्रतिनिधि पेशवा के रहने तथा राज्यकारभार के लिए महल रूप में बनाया गया था। इस महल के निर्माण का श्रेय पहले बाजीराव पेशवा को जाता है।
• शनिवार वाड़ा देखने कैसे जाएं?
पुणे महाराष्ट्र का एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र है तथा यह भारत के सभी प्रमुख शहरों से सड़क, रेल और हवाई मार्ग से जुड़ा हुआ है। यहाँ अंतरराष्ट्रीय विमान सेवा भी उपलब्ध है।
• पुणे शहर के शनिवार पेठ में यह वाडा स्थित है। इसी वाडे के कारण इस स्थान को शनिवारवाड़ा नाम मिला है।
• पुणे शहर के स्वारगेट से यह स्थान 3.5 किमी दूर है।
• पर्यटकों को शनिवार वाड़ा देखने के लिए 25 रुपये प्रवेश शुल्क देना होता है। और यह सुबह 8 बजे से शाम 6 बजे तक खुला रहता है।
शनिवार वाड़ा में देखने योग्य स्थल :
• ध्वज एवं लढाऊ पेशवा पहला बाजीराव का पुतला :
शनिवार वाड़े के बाहरी भाग में मराठा साम्राज्य के पराक्रमी लढाऊ बाजीराव पेशवा की अश्वारूढ़ प्रतिमा देखने मिलती है। उसके सामने ध्वजस्तंभ स्थित है जहाँ स्वतंत्र भारत का तिरंगा ध्वज गर्व से फहरता है।
• तटबंदी :
शनिवार वाड़ा 18वीं शताब्दी में निर्मित होने के कारण अपेक्षाकृत नई ऐतिहासिक रचना है। इसकी चारों ओर 6 मीटर (21 फीट) ऊँची और 289 मीटर (950 फीट) लंबी दीवार बनाई गई है। दीवार निर्माण के पहले नानासाहेब पेशवा ने तत्कालीन मराठा छत्रपति शाहू महाराज से अनुमति ली थी।
दीवार के निर्माण में नींव में पत्थर तथा ऊपर पक्की ईंटों का उपयोग किया गया है।
• बुर्ज :
वाड़े के चारों ओर मजबूत बुर्ज बनाए गए हैं। कुल 9 बुर्ज हैं। इनसे पहरेदारी तथा संकट समय में तोप प्रहार किया जाता था।
• दिल्ली दरवाजा :
शनिवार वाड़े के उत्तर भाग में विशाल दरवाजा है जिसे दिल्ली दरवाजा कहा जाता है। इस दरवाजे पर लोहे की मोटी शीट तथा नुकीले खिले लगे हैं ताकि शत्रु के हाथियों से बचाव किया जा सके।
यह दरवाजा 21 फीट ऊँचा और 14 फीट चौड़ा है।
दिल्ली पर अधिकार करने की इच्छा के कारण इस दरवाजे को दिल्ली दरवाजा नाम दिया गया था। इतना बड़ा है कि हत्ती अंबारी सहित आसानी से निकल सकता था।
• अन्य दरवाजे :
दिल्ली दरवाजे के अलावा वाडे में चार और दरवाजे हैं—
• गणेश दरवाजा
• खिड़की दरवाजा
• नाटकशाला / जांभूळ दरवाजा
• मस्तानी / अलीबहाद्दुर दरवाजा
नारायणराव पेशवा के शव को जिस दरवाजे से निकाला गया था उसे नारायण दरवाजा कहा जाता है।
• नगारखाना :
दिल्ली दरवाजे से अंदर आते ही बाईं तरफ ऊपर जाने वाली सीढ़ियाँ दिखती हैं। ऊपर पहुँचने पर एक मार्ग तटबंदी की ओर व दूसरा नगारखाने की ओर जाता है।
नगारखाने में आज भी पेशवेकालीन सुंदर लकड़ी की नक्काशी दिखाई देती है।
1828 की भयानक आग में अधिकांश हवेलियाँ नष्ट हो गईं, परंतु आग नगारखाने तक नहीं पहुँची और वह सुरक्षित बच गया।
नगारखाने से बाहर देखने पर बाजीराव पेशवा की प्रतिमा, ध्वजस्तंभ तथा अंदर की उद्यानरचना और अवशेष दिखाई देते हैं।
• गणेश रंगमहल (दरबार हाल) :
1755 में नानासाहेब पेशवा ने गणेश रंगमहल का निर्माण करवाया।
गणेशोत्सव में यहाँ गणेश स्थापना की जाती थी।
सभा मंडप इतना बड़ा था कि 100 नर्तक एक साथ नृत्य कर सकते थे।
यह स्थान दिवाणखाना नाम से भी प्रसिद्ध है।
• चिमण बाग :
गणेश रंगमहल के सामने सुंदर बगीचा है जिसे चिमण बाग कहते हैं।
यहाँ फुलों की सुगंध, आकर्षक वृक्ष तथा आठ तोटी वाले सुंदर फव्वारे देखने मिलते हैं।
हजारी और पुष्करणी कारंजे सवाई माधवराव के मनोरंजन के लिए बनाए गए थे।
गणेश रंगमहल के कारंजों में गिरकर सातवें पेशवा सवाई माधवराव की मृत्यु हुई थी।
• विहीर :
कारंजों के पास सुंदर चौकोनी बारव (विहीर) देखी जा सकती है।
• पेशवा निवास के अवशेष :
यहाँ पेशवा माधवराव, रघुनाथराव तथा सदाशिवराव की सात मंज़िला निवास इमारतें थीं।
1828 की आग में ये नष्ट हो गईं।
• दुधई महल :
पहले पेशवा बाळाजी विश्वनाथ के भाई की पत्नी गोदाबाई के लिए थोरले बाजीराव ने दुधई महल बनवाया था।
यहाँ निवास, स्नानगृह, तळघर तथा अन्य अवशेष अब भी दिखाई देते हैं।
• नारायण दरवाजा :
यहीं पेशवा नारायणराव की हत्या हुई थी।
उनके शव को इसी दरवाजे से निकाला गया, इसलिए इसे नारायण दरवाजा कहा जाता है।
• मोघल चित्रशैली :
वाड़े की दीवारों पर गणपती, शेषनाग पर विष्णु, महाभारत युद्ध जैसी सुंदर चित्रकला देखी जा सकती है।
आज इनमें से कई चित्र जीर्ण अवस्था में हैं।
• शनिवार वाड़ा में जलस्रोत :
गणेश दरवाजे से भूमिगत मार्ग द्वारा कात्रज तालाब से पानी लाने की योजना लागू की गई थी।
इसके लिए अंदर एक बड़े हौद का निर्माण किया गया था।
शनिवार वाड़ा – ऐतिहासिक घटनाएँ :
• 10 जनवरी 1730 को पहले बाजीराव पेशवा ने शनिवार वाड़े की नींव रखी।
• 22 जनवरी 1732 को निर्माण पूरा हुआ। दोनों दिन शनिवार होने के कारण नाम पड़ा—शनिवार वाड़ा।
• निर्माण में 16,120 रुपये खर्च हुए।
• 1755 में नानासाहेब ने गणेश रंगमहाल व बाहरी तटबंदी बनवाई।
• पेशवा बाजीराव, नानासाहेब, माधवराव, सवाई माधवराव—इन सभी ने यहीं से प्रशासन चलाया और मराठा मोहिमा यहीं से निकलीं।
• नारायणराव हत्या कांड :
माधवराव की मृत्यु के बाद उनके भाई नारायणराव को पेशवे पद मिला।
उनकी चुलती आनंदीबाई व रघुनाथराव ने षड्यंत्र कर गारद्यां से उनकी हत्या करवाई।
कहा जाता है कि आज भी रात में “काका, मुझे बचाओ” जैसा आवाज सुनाई देता है, पर कई लोग इसे मिथक मानते हैं।
• आगे की इतिहास-घटनाएँ :
• मराठा सरदारों ने बारभाई का कारस्थान कर नारायणराव की पत्नी के नवजात पुत्र को पेशवा बनाया व नाना फडणीस ने व्यवस्था संभाली।
• रघुनाथराव इंग्रजों के सहारे गए जिससे अंग्रेज-मराठा युद्ध हुए।
• 17 नवम्बर 1817 को अंग्रेजों ने शनिवार वाड़े पर कब्ज़ा कर मराठा शासन समाप्त किया।
• आगे ब्रिटिश कलेक्टर, पुलिस निवास और जेल के रूप में उपयोग हुआ।
• 1828 की आग में नगारखाने को छोड़कर सब नष्ट हुआ।
• 1919 में इसे राष्ट्रीय संरक्षित स्मारक घोषित किया गया।
• 1923 में अंग्रेजों के कोर्ट भवन को हटाकर खुदाई की गई।
• 1924 में शिवाजी पुल बनाने वाले केंजळी समुदाय ने भीतर मारुति मंदिर बनाया।
• 15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। आज शनिवार वाड़ा भारत सरकार के अधीन है और इसकी देखरेख पुणे महानगरपालिका करती है।
• यही है ऐतिहासिक शनिवार वाड़ा की जानकारी


























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